शनिवार, 21 सितंबर 2019

जीवन......मृत्यु !

✍️ जीवन ....मृत्यु, एक सच _____
जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबहा शाम।
कि रस्ता कट जाएगा मितरां.............
जीवन और मृत्यु एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जीवन निरंतरता का नाम, तो मृत्यु एक ठहराव, पड़ाव है। केवल अवस्था बदल रही होती है। प्रकृति में सभी कुछ परिवर्तनशील है, हर क्षण बदलता रहता है।जीवन है तो मृत्यु भी होगी, लेकिन वृद्धावस्था के साथ ही कई बार लोगों को यह डर सताने लगता है, और वह मृत्यु से भयभीत होने लगते हैं। इसकी गहराई को समझें, इस के स्वागत के लिए तैयार रहें। जिसका भी सृजन हुआ है विसर्जन निश्चित है। जीवन और मृत्यु को बड़े ही सुंदर तरीके से समझा जा सकता है। पंचभूतों (आकाश, जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी) से बने शरीर का ईश्वरीय महतत्व आत्मा, प्राणमय शरीर से संयोग जीवन एवं वियोग है मृत्यु है। दिन का अंत रात्रि है, तो जीवन का अंत मृत्यु है। मृत्यु के बाद फिर एक नवजीवन का आरम्भ होता है और यह क्रम सतत् चलता रहता है। पाश्चात्य विचारक हुए हैं कोल्टन, उनके शब्दों_ जिन्हें स्वतंत्रता भी मुक्त नहीं कर सकती, उन्हें #मृत्यु मुक्त कर देती है। यह उनकी प्रभावशाली चिकित्सा है, जिन्हें औषधि भी ठीक नहीं कर सकती। यह उनके लिए आनंद और शांति की विश्राम स्थली है, जिन्हें समय सांत्वना नहीं दे पाता। जिस प्रकार दिनभर की थकान के बाद हम निद्रा के आगोश में अपनी थकान मिटाते हैं और प्रातः स्फूर्ति, ताजगी के साथ उठते हैं, उसी प्रकार  मृत्यु भी एक महानिद्रा है।
जो आया है सो जाएगा, राजा रंक फकीर।।
गीता में भी कहा गया है, आत्मा तो अमर है वह केवल शरीर बदलती है। मृत्यु को ऐसा जानिए जैसे वस्त्र पुराने हो गए हों, उन्हें छोड़ कर और नवजीवन यानि नए कपड़े बदलना। और यह कार्य हमारी मां की तरह प्रकृति माता बखूबी निभाती है। प्रभु के इस निमंत्रण को सहर्ष स्वीकार कीजिए, मृत्यु जीवन का आवश्यक अंग है, अगर मृत्यु ना हो तो जीवन भार लगने लगेगा। इस तरह यह एक विश्राम अवस्था भी है। विदेशों में मृत्यु को अंत माना जाता है, लेकिन अपने देश मृत्यु के बाद नव जीवन शुरू करना मानते हैं, जहां से हमने छोड़ा था,या जो हमारे संचित कर्म हैं, उनके अनुसार आगे की दिशा तय होती है। हमारे देश में मृत्यु को भी उत्सव की तरह देखा जाता है। अंत में एक गाने के बोल याद आ रहे हैं ___
जिंदगी एक सफ़र है सुहाना
यहां कल क्या हो किसने जाना।
मौत आनी है आएगी इक दिन
ऐसी बातों से क्या घबराना।

बुधवार, 11 सितंबर 2019

जिंदगी से जुड़ी छोटी छोटी बातें


✍️जिंदगी से जुड़ी छोटी छोटी बातें।
माता पिता अक्सर बच्चों की प्रशंसा करने में कंजूसी कर जाते हैं, या अनावश्यक प्रशंसा करते हैं, दोनों ही चीजें गलत है। लेकिन बच्चे के अच्छे व्यवहार और उसके तरह तरह के प्रयासों की सराहना, प्रशंसा अवश्य करनी चाहिए। बचपन से ही हमें अपने बच्चों में सही दोस्त बनाने की, गलत दोस्तों को दूर रखने की समझ विकसित करनी चाहिए। बच्चों को समय का सम्मान करना सिखाएं। बच्चों को समय की कीमत जरूर समझनी चाहिए। समय की पाबन्दी आने से, उनकी जिंदगी में आगे के बहुत से कार्य #आसानी से हो जाते हैं। समय पर उठना, तैयार होना उन्हें स्कूल के जाने में होने वाली हड़बड़ी, परेशानी से बचाएगा। बच्चों को किसी की भी कोई चीज लेने से पहले उससे अनुमति लेने के लिए भी सिखाएं, क्योंकि कई बार छोटे बच्चे स्कूल में किसी दूसरे की कोई वस्तु अच्छी लगने पर (बाल सुलभ प्रकृति, इसे चोरी नहीं कह सकते) अगर घर ले आते हैं, तो बच्चों को सही गलत का अंतर समझाएं एवं उसको अगले दिन अवश्य लौटाने के लिए कहें। आप, बच्चों का स्कूल बैग प्रतिदिन चैक करें, कितनी #मांएं ऐसा करती हैं, और अगर देख भी लेती हैं, तो कितनी माताएं अपने बच्चों को समझाती हैं। बच्चों को प्लीज, थैंक यू कहना सिखाएं। एवं खुद भी अच्छा या बुरा होने पर थैंक्स और सॉरी कहें, झिझकें नहीं। किसी को सॉरी कहने का यह मतलब नहीं कि आप कमजोर हैं। बल्कि यह आपके मजबूत चरित्र को दर्शाता है।

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

भाषा और संस्कृति



️ ✍️ #भाषा और संस्कृति_____
भाषा संस्कृति की आत्माभिव्यक्ती का साधन है। मनुष्य की पहचान भी भाषा से ही है। भाषा ही मनुष्य को औरों (चौपायों) से  भिन्न करती है, यह जाति, धर्म, व्यवसाय, समाज संस्कृति के कारण भिन्न भिन्न हो सकती है। फिर भी विचार संप्रेषण के लिए भाषा ही माध्यम है। समाज के सांस्कृतिक पतन की आहट सबसे पहले उसकी भाषा में सुनी जा सकती है। हमें इतना समृद्ध साहित्य, समाज, भाषा, सब कुछ विरासत में मिला है, फिर भी हम उसकी कद्र नहीं करते हैं। भाषा द्वारा किया गया संस्कृति का चीरहरण, भाषा का दुरुपयोग आज देखने को मिलता है, उतना पहले नहीं था। वजह कुछ भी हो सकती है, व्हाट्स एप, हिंग्लिश और नई पीढ़ी द्वारा ईजाद की गई नई vocabulary  एवं परिवारों में जड़ें जमाती संवाद हीनता। इसलिए रोजमर्रा की भाषा में भी इसके दुरुपयोग बहुतायत से देखने को मिलता है, ऐसा करने से बचें। यह सहयोग, कम से कम उन व्यक्तियों से तो अपेक्षित है, जो यह लेख पढ़ रहे हैं। जैसा कि आजकल देखने में आता है, बच्चे भी अपने पिता से #यार कह कर बात करते हैं, उधर पिता भी अपनी बेटियों तक से #यार कह कर बात करते हैं, जो कि बिल्कुल ही सभ्यता ही नहीं अपितु संस्कार विहीन है। देखने में यह भी आता है कि, बड़ों से बदतमीजी से व छोटों से खुशामद वाली भाषा में बात करते हैं, जो कि बिल्कुल ही उचित नहीं है। यार शब्द लड़कों का अपने #बराबरी दोस्ती में तो ठीक है, लेकिन लड़कियों के लिए यह शब्द उचित नहीं है। कुतर्क करने के लिए हो सकता है, मेरे विचारों को रूढ़िवादी कहा जाए। मुझे एक वाकया याद आ रहा है, मेरी बेटी की मित्र आई हुई थी। किसी बात पर चर्चा के दौरान बेटी ने एक #शब्द #क्लिष्ट) का प्रयोग किया। उसकी मित्र को यह समझ में ही नहीं आया, फिर उसने इसका मतलब पूछा। वो हैरान थी, की तुम लोग ऐसे कठिन शब्दों का प्रयोग कैसे करते हो, जबकि यह हमारे परिवार में आम बात है। एक तो आजकल बच्चों को शुरू से हॉस्टल भेज देना भी संस्कृति से दूर कर रहा है। बच्चा पढ़ाई में अच्छा हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि संस्कारों में भी अच्छा हो। क्योंकि उम्र के शुरुआती वर्षों में, उस समय वह अपने मन की कर सकता है। और कोई भी गलत चीज आसान भी लगती है, एवं आकर्षित भी करती है। सबसे पहले भाषा पतित होती है, भाषा का स्तर गिरता है, और इसके बाद संस्कार नष्ट होते हैं। वहीं से सभ्यता और संस्कृति का कलंकित होना, और आगे जाकर संस्कृति व सभ्यता का नष्ट होना आरंभ होता है। भाषा को लयबद्ध तरीके से प्रेषित किया जाए तो संगीत बन जाए, और लिपिबद्ध किया जाए तो ग्रंथ बन जाए। शब्दों का व्यवस्थित प्रयोग ही #मंत्र बन जाता है। तो अपनी भाषा और व्यवहार पर ध्यान दीजिए। बोली ही तो है जो मित्र बनाती है, और इसी भाषा से `जूता खात कपाल' कहावत सिद्ध हो जाती है। आप जितना अच्छा अपनी भाषा में सोच सकते हैं, उतना दूसरी में नहीं। इसलिए भाषा की समृद्धि के प्रयास जारी रखिए।