मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

प्रौढ़ावस्था _ संघर्ष/सामंजस्य


प्रौढ़ावस्था_ संघर्ष / सामंजस्य
नई और पुरानी पीढ़ी में वैचारिक मतभेद हमेशा से चला आ रहा है। नई बात नहीं है, लेकिन जितनी दूरियां आज बढ़ गई हैं, उतनी पहले नहीं थीं। लोगों में अधिक से अधिक पाने, सुख भोगने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है,और इसके चलते परिवार संस्कृति, विघटन  की ओर बढ़ रही है। जहां पुरानी पीढ़ी प्रौढ़ावस्था में स्वयं को हर कार्य के लिए सही मानते हुए, नई पीढ़ी को अपने समय की परंपराओं एवं मान्यताओं को ही नहीं, बस केवल और केवल आदेश मानने के लिए विवश करने के साथ ही उचित ठहराने का प्रयास करती है, वहीं स्वतंत्र विचारों वाली नई पीढ़ी भी कई बार अपने को पूर्ण परिपक्व मानते हुए आधुनिक परिवेश में रहना पसंद करती है। संघर्ष का कारण यह नहीं है कि नई पीढ़ी बुरी है, या पुरानी पीढ़ी बुरी है। बुरा है सोचने का, अपेक्षाओं का, नकारात्मकता को पोषित करने का तरीका। वास्तविक समस्या यह है कि दोनों ही पीढ़ियां अपने अहम की संतुष्टि के साथ खुद को ही श्रेष्ठ मानते हुए, अपने लिए एक विशेष स्थान प्राप्त करने की इच्छा रखती हैं। यह अंतर हम मनुष्यों में ही नहीं जानवरों में भी होता है। सबको अपने अधिकार, स्थायित्व की चिंता बनी रहती है। वानरों के किसी भी दल में एक ही नर वानर होता है, और उसी का अधिकार होता है। उसी दल में जब वानरों के बच्चे युवा होते हैं तो दल पर आधिपत्य के लिए युवा वानरों एवं बुजुर्ग नर वानरों के मध्य मरने मारने का द्वंद होता है, कुत्तों, शेरों के अपने इलाके में दूसरे की घुसपैठ पर लड़ाई, हाथियों के झुंड में भी ऐसा विरोध अक्सर देखने को मिलता है। यह सब आधिपत्य की लड़ाई के लिए है। लेकिन हमें (बुजुर्गों को) कुछ सीख #पक्षियों से भी लेने की जरूरत है। जो बच्चों को पालते हैं, पोसते हैं और समय के साथ छोड़ देते हैं अपनी जिंदगी जीने के लिए, उड़ान भरने के लिए। हम पशु तो नहीं हैं, विवेक भी है, फिर अहम, जिद छोड़ क्यों नहीं रहे। हर चीज, पूर्वाग्रहों को, कम्बल की तरह लिपटाए बैठे हैं। समय के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए, जो कल आपका था, आज #हस्तांतरण के लिए तैयार रहिए, विवश होकर नहीं, खुशी खुशी। कभी आप भी युवा थे, उस स्थति को भी याद कर सकते हैं, कितने बदतमीज या हेकड़ थे? याद आया? ऐसा तो हो नहीं सकता कि जिन युवाओं को आज उद्दंड, बदतमीज बताया जा रहा है, वह बुजुर्ग होते ही निरीह और सीधा सरल हो जाएगा, हो सकता है आप भी उनमें से एक हों। इसलिए नई पीढ़ी को कोसना बंद कर, थोड़ा सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश करें। नई और पुरानी पीढ़ी में हमेशा विचारों में अंतर रहा है। इसी अंतर से पीढ़ियों में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है। दरअसल आज की जीवन शैली व परिस्थितियों में तेजी से बदलाव आया है। वर्तमान में देश जिस बदलाव के दौर से गुजर रहा है, आशंका है कि नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के संबंधों का भविष्य क्या होगा? दिखने लगा है। एक असुरक्षा का भाव बना हुआ है। रिश्तों में मिठास कम हो रही है, असुरक्षा, संदेह घेरे हुए है। भौतिकतावाद भी एक वजह हो सकती है। पिछले चार पांच दशक में विज्ञान के प्रभाव से हमारा रहन-सहन एवं व्यवहार भी अछूता नहीं है। परिवर्तित व्यवस्था से नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी में दूरियां स्पष्ट नजर आने लगी हैं। आधुनिक व्यवस्था एवं मान्यताओं से प्रभावित नई पीढ़ी वर्षों से चली आ रही परंपरा, संस्कारों एवं मान्यताओं वाली पुरानी पीढ़ी में सामंजस्य की कमी निरंतर बढ़ रही है, जैसे-जैसे संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है मानसिक रोगों की वृद्धि होती जाती है। जब मानसिक रोगों का निवारण नहीं किया जाए तो कालांतर में, शारीरिक रोग का रूप ले लेता है। इसी कारण प्रौढ़ ही नहीं, युवावस्था में भी अनेक रोगों से ग्रसित हो रहे हैं। प्रत्येक व्यक्ति के विचार भिन्न भिन्न होते हैं, हर कोई हमारी इच्छा के अनुरूप ही कार्य करें यह संभव नहीं है। जिन्हें हमने सर्वस्व लुटा कर लाड़ प्यार के साथ बड़ा किया है, यदि उनकी खुशी के लिए हमारे जीवन में कुछ परिवर्तन कर लिया जाए तो दोनों पीढ़ियों का जीवन आनंदमय में हो सकता है।इसमें नुकसान भी कहां है। यदि पुरानी पीढ़ी तीव्र गति से हो रहे परिवर्तन के साथ नई पीढ़ी की महत्वाकांक्षा को समझ कर उनके जीवन में सहयोगी बने, तथा नई पीढ़ी भी पुरानी पीढ़ी की भावनाओं को समझते हुए #सामंजस्य स्थापित कर उनका आदर करे, तो दोनों पीढ़ियां एक सुखद भविष्य की ओर अग्रसर होती हैं। बच्चों को अनुभव के साथ अच्छी सुरक्षित परवरिश मिलेगी, तथा बुजुर्गों को मान सम्मान के साथ उचित सेवा व देखभाल, अन्यथा दोनों ही पीढ़ियां सुखी नहीं रह सकती और ना ही तरक्की कर सकती हैं। लोगों की अपेक्षाओं व आकांक्षाओं में भी बदलाव आया है। जीवन में हम #बुजुर्ग अपने अहम् को त्याग कर अपनों के साथ सामंजस्य स्थापित कर फिर आनंददायक जीवन की शुरुआत करें, एवं अच्छे समाज एवं राष्ट्र का निर्माण का मार्ग प्रशस्त करें। यह जिम्मेदारी हम बुजुर्ग व्यक्तियों की बनती है, जिसमें युवा भी सहयोग करें। लेकिन शुरुआत हम बुजुर्गों को ही करनी चाहिए, बड़प्पन भी इसी में है। कब तक झूठे अहम के साथ जिएंगे। सूखे ठूंठ की तरह अकड़ना क्या उचित है, नहीं तो टूटने के लिए तैयार रहें। थोड़ा धैर्य व व्यवहार में लचीलापन तो होना ही चाहिए।

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